रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए अब कोई संसाधन नहीं… बांग्लादेश ने की यूएन से हस्तक्षेप की अपील की है। बांग्लादेश ने साफ़ कर दिया है कि उसके पास 13 लाख रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए और अधिक संसाधन नहीं हैं। देश के मुख्य सलाहकार और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से इस संकट का स्थायी समाधान खोजने की अपील की।
सोमवार को एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए यूनुस ने कहा कि 2017 में म्यांमार में हुए हिंसक सैन्य अभियान के बाद से बांग्लादेश में रह रहे इन 13 लाख शरणार्थियों ने देश की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और शासन पर भारी दबाव डाला है। उन्होंने कहा, “हमारे सामने कई घरेलू चुनौतियाँ हैं, ऐसे में हमारे पास घरेलू स्रोतों से और अधिक संसाधन जुटाने का कोई रास्ता नहीं है।”
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शरणार्थी कर रहे हैं वापसी की मांग
यह टिप्पणी रोहिंग्या शरणार्थियों के बांग्लादेश आने की आठवीं वर्षगांठ के मौके पर आई है। 2017 में केवल कुछ ही दिनों के भीतर 7 लाख से अधिक रोहिंग्या म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश आ गए थे, जिससे कॉक्स बाज़ार के आसपास का इलाका दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी बस्ती बन गया।
इन शिविरों में, रोहिंग्या घनी बांस की झोंपड़ियों में रहते हैं, जहां सहायता कम होती जा रही है और स्कूलों को बंद कर दिया गया है। उन्हें घर लौटने की बहुत कम उम्मीद है। रोहिंग्या समुदाय के एक नेता सैयद उल्लाह ने कहा, “पिछले सात सालों में हमने अनगिनत सम्मेलन देखे हैं, लेकिन हमारे लिए कुछ भी नहीं बदला है। हम अभी भी बिना किसी अधिकार, भविष्य या घर वापसी की गारंटी के शिविरों में फँसे हुए हैं।”
म्यांमार से आए हज़ारों रोहिंग्या शरणार्थियों ने अपने सामूहिक पलायन की आठवीं वर्षगांठ मनाई और अपनी मातृभूमि रखाइन राज्य में सुरक्षित वापसी की मांग की।
25 अगस्त 2025 को को कॉक्स बाज़ार के कुतुपालोंग शिविर में बड़ी संख्या में शरणार्थी एक खुले मैदान में जमा हुए। उन्होंने “अब और शरणार्थी जीवन नहीं” और “घर वापसी ही अंतिम समाधान है” जैसे नारे लिखे बैनर और पोस्टर लहराए। वे इस दिन को “रोहिंग्या नरसंहार स्मरण दिवस” के रूप में मना रहे थे। प्रदर्शनकारियों में से एक 19 वर्षीय नूर अज़ीज़ ने कहा, “हम म्यांमार में अन्य जातीय समूहों की तरह समान अधिकारों के साथ अपने देश वापस जाना चाहते हैं। जो अधिकार उन्हें म्यांमार में नागरिकों के रूप में मिल रहे हैं, हम भी उन्हीं अधिकारों का आनंद लेना चाहते हैं।”
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अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सुरक्षित वापसी की अपील
इसी बीच, बांग्लादेश के अंतरिम नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने रोहिंग्या संकट पर एक तीन दिवसीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से उनकी सुरक्षित वापसी की प्रक्रिया में सहयोग करने का आग्रह किया।
अंतर्राष्ट्रीय गणमान्य व्यक्तियों, संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों, राजनयिकों और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने शरणार्थियों को भोजन और अन्य सहायता प्रदान करने और उनकी स्वैच्छिक वापसी प्रक्रिया को तेज़ करने पर चर्चा की।
यूनुस ने कहा कि “रोहिंग्या का अपनी मातृभूमि से संबंध खत्म नहीं किया जा सकता।” उन्होंने सभी पक्षों से “उनकी शीघ्र, सुरक्षित, सम्मानजनक, स्वैच्छिक और टिकाऊ वापसी के लिए एक व्यावहारिक रोडमैप तैयार करने” का आह्वान किया।
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म्यांमार में हिंसक स्थिति और सहायता में कटौती
अगस्त 2017 में, रखाइन राज्य में विद्रोही हमलों के बाद म्यांमार ने एक क्रूर सैन्य अभियान चलाया था। इस अभियान के पैमाने, संगठन और क्रूरता ने संयुक्त राष्ट्र सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से जातीय सफ़ाई और नरसंहार के आरोप लगाए। इसके बाद ही हज़ारों रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार छोड़ना शुरू कर दिया था।
तब की प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली बांग्लादेश सरकार ने सीमा खोल दी, जिससे 7 लाख से अधिक रोहिंग्या को शरण मिली। इसके अलावा, 3 लाख से अधिक रोहिंग्या पहले से ही बांग्लादेश में रह रहे थे।
2017 के बाद से बांग्लादेश ने कम से कम दो बार शरणार्थियों को वापस भेजने का प्रयास किया है और म्यांमार सरकार पर शांतिपूर्ण वातावरण स्थापित करने के लिए दबाव बनाने का आग्रह किया है। हालांकि, रखाइन राज्य में स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई है। वहीं, बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी अब दानदाताओं द्वारा सहायता में कटौती जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यूनुस ने इस लंबी खिंची समस्या को जल्द हल करने के लिए सभी क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हितधारकों से म्यांमार और अराकान सेना के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने का आग्रह किया।
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म्यांमार में हालात अभी भी अस्थिर
म्यांमार के पश्चिमी रखाइन प्रांत में सैन्य जुंटा और अराकान आर्मी के बीच लड़ाई बढ़ने के कारण पिछले एक साल में 1.5 लाख और रोहिंग्या बांग्लादेश पहुंचे हैं। म्यांमार की सेना इन ऑपरेशनों को “आतंकवाद-विरोधी अभियान” कहती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इसे जातीय सफ़ाई का हिस्सा मानता है।
2018 और 2019 में रोहिंग्या की वापसी के प्रयास विफल रहे क्योंकि शरणार्थियों ने मुकदमा चलने के डर से वापस जाने से इनकार कर दिया था। एक शरणार्थी हफ़ीज़ुर रहमान ने अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, “एक समय दुनिया ने हमारा समर्थन किया था, लेकिन अब ऐसा लगता है कि हमें अकेले ही संघर्ष करने के लिए छोड़ दिया गया है।”
यूनुस ने सभी पक्षों से रोहिंग्या लोगों के सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वैच्छिक वापसी के लिए काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “रोहिंग्या का अपनी मातृभूमि से संबंध नहीं तोड़ा जा सकता।”