पेट में जाकर प्लास्टिक पैदा कर रहा है न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग के साथ-साथ गुर्दे और यकृत रोग संबंधी रोग

पेट में प्लास्टिक जाने से तमाम तरह की गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं। एक अध्ययन से पता चला है कि जिन पक्षियों के पेट में प्लास्टिक था, उनमें न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग के साथ-साथ गुर्दे और यकृत रोग के लक्षण भी थे।

‘साइंस एडवांसेज’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में समुद्री पक्षियों के पेट में प्लास्टिक होने और न होने पर, उनमें पाये जाने वाले 745 प्रोटीनों में होने वाले बदलावों की तुलना की गई। इस अध्ययन में ‘सैबल शीयरवाटर’ (समुद्री पक्षी, आर्डेना कार्नेइप्स) पर ध्यान केंद्रित किया गया।

सैबल शीयरवाटर 90 दिन से कम उम्र के थे और स्वस्थ दिख रहे थे। अपनी कम उम्र के बावजूद, जिन पक्षियों के पेट में प्लास्टिक था, उनमें न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग के साथ-साथ गुर्दे और यकृत रोग के लक्षण भी थे।

‘न्यूरोडीजेनेरेटिव’ रोग, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र में तंत्रिका कोशिकाओं के धीरे-धीरे टूट कर नष्ट होने की स्थिति है। इसमें पेट की परत को भी काफी नुकसान पहुंचने के साक्ष्य मिले, जो संभवतः ऊतकों में मौजूद सूक्ष्म प्लास्टिक के कारण हुआ था। इसका मतलब यह हुआ कि जो प्रोटीन केवल पेट में ही पाए जाने चाहिए थे, वे रक्त में भी पाये गये।

अध्ययन में मिले निष्कर्ष सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य से संबंधित नहीं हैं, लेकिन नतीजे पक्षियों के स्वास्थ्य पर प्लास्टिक के घातक और धीमे प्रभाव की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं, भले ही इससे पक्षियों की मौत न हो।

हानिकारक तो है लेकिन जानलेवा नहीं?

कुछ अध्ययनों में प्लास्टिक के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का पता चला है, जबकि अन्य अध्ययनों में ऐसा नहीं पाया गया है। प्लास्टिक के संपर्क में आने पर होने वाले शुरुआती अध्ययन में सिर्फ एक प्रतिक्रिया को देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, यह जानवर के शरीर की स्थिति हो सकती है।

यह अध्ययन महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन इनमें उन विभिन्न परिस्थितियों का ध्यान नहीं रखा जाता जिनका वास्तविक रूप से कोई जानवर अनुभव कर सकता है। यदि आप हाल में बीमार हुए हैं, तो स्वास्थ्य जांच में आपकी प्रतिक्रिया पूरी तरह स्वस्थ होने की तुलना में अलग हो सकती है। पक्षियों पर भी यह बात लागू होगी। हाल में कुछ अधिक गहन अध्ययनों के जरिये पक्षियों पर प्लास्टिक के प्रभावों को लेकर एक दस्तावेज तैयार किया गया है। ये प्रभाव हानिकारक थे, लेकिन इतने गंभीर नहीं थे कि मौत का कारण बन जाएं।

उदाहरण के लिए, प्लास्टिक खाने वाले पक्षियों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक था, वे आकार में छोटे थे और उनके पंख भी छोटे थे।

प्रोटीन का अध्ययन

कुछ मुख्य प्रोटीन बीमारी के संकेतक हैं। उदाहरण के लिए प्लास्टिक खाने वाले पक्षियों के खून में एल्बुमिन नामक प्रोटीन का निम्न स्तर मिला। एल्बुमिन का कम होना यकृत में खराबी का संकेत है। हमारे नतीजों से पता चलता है कि हालांकि सभी पक्षी प्लास्टिक के संपर्क में आने से नहीं मरते, लेकिन उनमें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। प्लास्टिक खाने से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी अनेक प्रभाव पेट पर भी पड़ते हैं। हमारे निष्कर्षों में पेट की परत को उल्लेखनीय क्षति का पता चला है। यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि प्रोटीन विश्लेषण के माध्यम से जो भी चिंताजनक स्वास्थ्य प्रभाव पाए गए, ये सभी बहुत ही कम उम्र के उन पक्षियों में पाये गये थे, जो दिखने में स्वस्थ थे।

क्या ये निष्कर्ष हमारी इस समझ को बदल सकते हैं कि सूक्ष्म प्लास्टिक का संपर्क मानव स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है? यह भविष्य के शोध का काम है, लेकिन यह आसान नहीं है। वास्तविकता यह है कि दुनिया की ज्यादातर जंगली प्रजातियों के लिए हमारे पास कभी भी तुलनीय आंकड़ा नहीं हो सकता है। प्रयोगशाला में एक पक्षी प्रजाति में इस समस्या की जटिलता को समझने के लिए एक दशक का समय लगा। मनुष्यों के लिए प्लास्टिक के प्रभाव की मात्रा कभी निर्धारित कर पाना संभव नहीं हुआ है।

हालांकि इन पक्षियों पर किए गए अध्ययन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। एक समाज के रूप में, यह मनुष्यों के हित में है कि पक्षियों की कहानी सुनें, जो वे हमें बताने की कोशिश कर रहे हैं। (द कन्वरसेशन)

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