बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार में स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में रह रहे बच्चों का भविष्य खतरे में है। अमेरिका द्वारा रोकी गई अंतरराष्ट्रीय सहायता के कारण मानवीय संकट गहरा गया है।
फंडिंग की कमी की वजह से स्कूलों को बंद करना पड़ा है, जिसके चलते हजारों बच्चों को शिक्षा से वंचित होना पड़ रहा है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि परिवार अपनी बेटियों को कम उम्र में ही शादी के लिए मजबूर कर रहे हैं, ताकि वे सुरक्षित रह सकें और उन पर समाज का दबाव कम हो सके।
शिक्षा का अभाव, शोषण की आशंका
कॉक्स बाज़ार के एक शरणार्थी शिविर में अपनी 16 साल की बेटी की शादी करके राहत महसूस कर रही बेगम का दर्द इस मानवीय त्रासदी को बयां करता है। उन्होंने कहा, “स्कूल के बिना लड़कियाँ खाली बैठी रहती हैं और लोग तरह-तरह की बातें करने लगते हैं। मुझे डर लग रहा था, शादी ही एकमात्र विकल्प था।” बेगम के इस कदम से पता चलता है कि शिक्षा की अनुपस्थिति में कैसे ये परिवार अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं और मजबूरन उन्हें बाल विवाह जैसे कदमों की ओर धकेल रहे हैं।
यूनिसेफ ने जून में अपने 4,500 से ज़्यादा स्कूलों को बंद कर दिया, जिससे 2,27,500 से ज़्यादा रोहिंग्या बच्चे शिक्षा से वंचित हो गए। इसके कारण करीब 1,200 बांग्लादेशी शिक्षक और कई रोहिंग्या शिक्षक भी बेरोजगार हो गए। अंतर्राष्ट्रीय बचाव समिति (IRC) का अनुमान है कि लगभग 500,000 बच्चे अब शिक्षा से दूर हैं।
शिक्षा के अभाव में ये बच्चे न केवल ज्ञान से दूर हो रहे हैं, बल्कि बाल श्रम, जुआ, यौन शोषण और मादक पदार्थों की लत का शिकार होने के भी ज़्यादा जोखिम में हैं। IRC के अनुसार, इस साल बाल विवाह के मामलों में 3% और बाल श्रम के मामलों में 7% की वृद्धि हुई है।
रोहिंग्या शरणार्थियों का इतिहास और विस्थापन
रोहिंग्या, मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के लोग हैं जो सदियों से म्यांमार (पूर्व में बर्मा) के रखाइन राज्य में रहते आए हैं। म्यांमार की सरकार उन्हें कानूनी रूप से नागरिक नहीं मानती और उन्हें बांग्लादेश के अवैध प्रवासी मानती है। 1982 के म्यांमार नागरिकता कानून ने उन्हें नागरिकता से वंचित कर दिया, जिससे उनकी स्थिति और भी असुरक्षित हो गई।
म्यांमार में रोहिंग्या लोगों को लंबे समय से भेदभाव, उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ा है। 2017 में म्यांमार की सेना ने रखाइन राज्य में रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ क्रूर सैन्य अभियान चलाया। इस अभियान को संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं ने “जातीय सफाए का एक उदाहरण” बताया। इस हिंसा के बाद, 7,00,000 से ज़्यादा रोहिंग्या अपनी जान बचाने के लिए बांग्लादेश भाग गए, जिससे यह दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी बस्ती बन गई। वर्तमान में बांग्लादेश में लगभग 12 लाख रोहिंग्या शरणार्थी हैं, जिनमें से आधे बच्चे हैं।
रोहिंग्या विवाद और अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती
रोहिंग्या संकट एक जटिल मुद्दा है। म्यांमार सरकार उन्हें अपना नागरिक मानने से इनकार करती है, जबकि रोहिंग्या खुद को म्यांमार का मूल निवासी मानते हैं। इस विवाद के कारण उनका भविष्य अनिश्चित है।
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के मुताबिक, रोहिंग्याओं की सहायता के लिए इस साल $256 मिलियन की आवश्यकता है, लेकिन अब तक उन्हें केवल 38% ही मिल पाया है। फंडिंग में यह कमी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में की गई अंतर्राष्ट्रीय सहायता में कटौती के कारण हुई है।
इस कटौती का सीधा असर शरणार्थियों के जीवन पर पड़ रहा है। UNHCR की प्रतिनिधि जूलियट मुरेकेइसोनी ने कहा, “यह समुदाय पहले ही सब कुछ खो चुका है और अब धन की भारी कमी का सामना कर रहा है, जिससे उनका अस्तित्व खतरे में है।” उन्होंने बताया कि भोजन, स्वास्थ्य सेवाएँ, खाना पकाने का ईंधन और शिक्षा जैसी जीवन रक्षक सहायता समाप्त होने के कगार पर है।
रोहिंग्या शिक्षक नासिर खान ने कहा, “अब बच्चे सिर्फ़ कीचड़ या बारिश में खेलते हैं। वे वह सब कुछ भूल रहे हैं जो उन्होंने कभी सीखा था। शिक्षा के बिना, वे अंधे हो जाते हैं।” उन्होंने कहा कि यह ऐसी पीढ़ी है, जिनसे सब कुछ ‘छीन लिया गया।
शरणार्थी शिविर की एक तपती गली में, मोहम्मद फ़ारूक़ दोपहर की धूप में अपनी दो छोटी बेटियों के नाम पुकारते हुए टहल रहे हैं। कभी ये लड़कियाँ फटी हुई कॉपियाँ हाथ में लेकर स्कूल भागती थीं। आज, वे शिविर की बाँस की झोपड़ियों के बीच बेमतलब भटकती रहती हैं।
म्यामार से 2017 में भागकर आए 6 बच्चों के पिता फारुक ने कहा, “हमारे बच्चे जो थोड़ी-बहुत शिक्षा सीख सकते थे, वह छीन ली गई। हम म्यांमार में नरसंहार से बच गए, हम यहाँ बाढ़ और आग से बच गए – लेकिन अब हमारे बच्चों का भविष्य चुपचाप मारा जा रहा है।” फ़ारूक़ के लिए यह संकट असहनीय लगता है। उन्होंने कहा कि अगर हमारे बच्चे पढ़ाई नहीं कर सकते, तो उनका कोई भविष्य नहीं होगा…हमारे वतन वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं है, और यहाँ उनके पास कुछ भी नहीं है।
इस समय कॉक्स बाज़ार में 12 साल से कम उम्र के किसी भी रोहिंग्या बच्चे को शिक्षा नहीं मिल पा रही है। अंतर्राष्ट्रीय बचाव समिति (आईआरसी) के अनुमान के अनुसार लगभग 500,000 बच्चे अब शिक्षा से वंचित हैं। आईआरसी का कहना है मानवीय सेवाओं में कमी के पहले से ही गंभीर परिणाम हो रहे हैं और इस वर्ष बाल विवाह के दर्ज मामलों में 3% और बाल श्रम के मामलों में 7% की वृद्धि हुई है । ये आँकड़े शायद सीमित निगरानी और कलंक के कारण कम आँके गए हैं।आईआरसी की बांग्लादेश निदेशक हसीना रहमान ने कहा, “हर दिन, ज़्यादा से ज़्यादा परिवार जीवनयापन के चरम तरीकों का सहारा लेते रहेंगे। इनमें जुआ खेलने, बच्चों को शादी के लिए बेचने और जबरन मज़दूरी के साथ ही यौन शोषण भी बढ़ेगा।”
‘यूनिसेफ का कहना है कि “वैश्विक प्राथमिकताओं में बदलाव” के कारण योगदान में कमी आई है। यूनिसेफ प्रतिनिधि राणा फ्लावर्स ने कहा, “हर डॉलर का सदुपयोग करने के लिए, हमने यूनिसेफ के कर्मचारियों की संख्या कम की है, कार्यक्रमों को सुव्यवस्थित किया है और जहाँ भी संभव हो, लागत में कटौती की है। लेकिन ज़रूरतें उपलब्ध संसाधनों से कहीं ज़्यादा हैं।”